सोचा था कि बदल गए है ये दिन
यहाँ तो पढ़ने वाले भी, रहे गए अज्ञान।

स्वाधीनता का बात, जो हंसते खिलते करते है
हमारा खुशी, हसी उनसे रोज चुभते है ।

संदेश समानता का, ज़ुबान से सुनाते हैं,
बीज जो अपमान का दिल में बोते हैं।

भले ही ज्ञान का भंडार हो इनके सर पर
समाज में भाईचारा के करते रोज तार-तार।

ऊंचा सोच, न्याय की करते है
समाज में खाई बने रहे, नीच विचार पर चलते है।

ज्ञान का बात तो करते है
किस चीज का ज्ञान,
जब दूसरों को ज्ञान का मौका ही नहीं देते है।

पढ़ें लिखे बाहर से नजर आते है।
अंदर से, ऊंच-नीच का उभरता हुआ एक मंदिर है।

सोच न बदला, न समाज बदला
कौन कहता है कि, अनपढ़ लोग असिखित है
हमें तो यहां पढ़े लिखे लोग असिखित मिला।

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कशिश कुमार
यू.जी. माँ मणिकेश्वरी विश्वविद्यालय, भवानीपटना